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Sep 1, 2013

On Ajmal Kasab by Soumya Malviya

क़साब
 

एक अरसा हो गया था क़साब

सुनते हुए तुम्हारा नाम

इस बीच ये भी पढ़ा अख़बारों में कि कब तुमने जम्हाई ली!

किसी सत्र में तुम मुस्कुराये भी शायद!

कुछ जिरह की अपनी तरफ़ से

अपने वकील से कहा कुछ

और भी बहुत कुछ सुना, पढ़ा, देखा तुम्हारे बारे में कई बार

इतना कि कुछ अपनापन सा हो गया था तुमसे!

जैसे हमारे असंदिग्ध नरक में तुम देर तक और दूर तक चलने वाला

कोई इंतज़ाम हो गए थे

समाचार चैनल आये दिन

तुम पर 'ओपिनियन पोल' चलाते थे

और ख़ुश थीं मोबाइल कम्पनियाँ की राष्ट्रहित में बटन दबाने को

कई तत्पर और तत्सम भारतीय

सदैव तैयार होते थे

पुटुर-पुटुर, पट-पट

दाहिने-बाएँ, दाहिने-बाएँ

पुटुर-पुटुर, पट-पट

फिर एक दिन अचानक

एक निष्कपट से लग रहे बुधवार को

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने

तुम्हें फाँसी पर लटका दिया

गहरी गोपनीयता में मगर,

चुपचाप, गुपचुप-गुपचुप

दम साधे रहस्य का तम साधे हुए

यरवदा जेल के गाँधी अनुप्राणित वातावरण में

तुम्हारी झूलती हुई देह वह अक्ष बनी

जिस पर थिर हुआ राजनीतिक संतुलन

और कुछ संतरियों, अधिकारियों और

एक सरकारी डॉक्टर के बीच

जनतंत्र शिरोमणि हुआ!

पर जो भी हुआ इस ख़ामोश-लबी के साथ क्यूँ हुआ

तुम कोई भगत सिंह तो थे नहीं !

कि जेल के दरो-दीवार तक इस फ़ैसले से

बग़ावत कर उठते

फिर ये एहतियात ये चुप्पा-घात क्यूँ?

शायद इसलिए कि प्रतिशोध

चाहे वह दुनिया के

सबसे बड़े लोकतंत्र ने ही क्यूँ न लिया हो

कहीं न कहीं लज्जास्पद भी होता है

क्या तुमसे इंतक़ाम लेकर

कुछ घंटों के लिए ही सही

आर्यावर्त शर्मसार हो गया था क़साब !

हत्या के बाद का चेतनालोप

वह जो कुछ देर के लिए हत्यारे को शून्य कर देता है ...

पता नहीं क्यूँ

पर लोकतंत्र की इस तरतीब से मुझे

भगत सिंह का ध्यान हो आया है

भगत सिंह, क़साब तुम जानते नहीं होगे शायद

वह बीसवीं सदी के बसंत का

एक क्रांतिचेता बीज था

तुम्हें तो यह कौल भी नहीं होगा

कि तुमने जो क्या वो क्यूँ किया

पर उसे क़साब, भगत सिंह को

वह जो गुजराँवाला पाकिस्तान में जन्मा था

उसे सब पता था

जैसे इतिहास की कच्छप गति

कब ख़रगोश की तरह हो जाती है

और किस तरह वह एक गहरे गढ्ढे में गिर जाता है

इसलिए क़साब भगत सिंह

एक कठिन चुनौती था

उसे मारा ब्रिटिश हुकूमत ने यूँ ही मुँह चुराकर

जैसे नवम्बर की एक सुबह

कुहासे का भेद छटने से पहले ही तुम्हें

फाँसी पर लटका दिया

पर तुम क़साब

कोई फ़लसफ़ाई इंक़लाबी तो थे नहीं

कार्गो पहने और कलाशनिकोव से अँधाधुंध गोलियाँ बरसाते

तुम किसी विडियो-गेम के मूर्तिमना पात्र जैसे मालूम हुए थे

और फिर ये मीडिया वाले तो तुम्हें

आतंकी का भी ओहदा नहीं देते क़साब

वे तो तुम्हे बंदूक़धारी या 'गनमैन' बुलाते हैं

तुम तो शायद बिना जाने ही मर गए

कि तुमने क्या किया

और ख़ुदा जाने जन्नत का एक पाक परिंदा बनने का

तुम्हारा सपना पूरा हुआ भी या नहीं

पर हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि तुमसे हमें क्या मिला

तुमने हमें अमेरिकी 9/11 की तर्ज पर

अपना, ख़ालिस अपना 26/11 देकर

घटनाओं की दुनिया में स्वराज दिया क़साब

शायद इसीलिए तुम्हे गाँधी के जेल यरवदा ले गए थे ...

तुम शायद "एक्स " थे क़साब

जिसे गणित में सवाल हल करने के लिए फ़र्ज कर लेते हैं

तुमसे भी तो हल किये गए कई सवाल

जैसे कि चुस्त ही हुआ राष्ट्र का समीकरण,

धर्म के प्रमेय सिद्ध हुए,

सत्ता की खंडित ज्यामिति ने अपनी सममिति पा ली

इसीलिए शायद तुम्हें ठिकाने लगाने की योजना को

नाम दिया गया "ऑपरेशन एक्स" ...

क़साब फ़रीदकोट की धरती एक्स ही जनती है

और तुम जानते नहीं कि तीसरी दुनिया में कितने फ़रीदकोट हैं

धरती के चेहरे पर चकत्तों की तरह उभरे हुए

क़साब तुम्हारी मौत

कोई अंत नहीं, एक्स जैसे चरों की चरैवेति है ...

तुम तो मर गए क़साब

पर हमारे लिए कई सवाल पैदा कर गए हो

जैसे अगर विश्व के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र का राष्ट्रपति

13 साल की उम्र में घरबदर हो गया होता

तो उसका क्या होता?

क्या तब भी उसे नोबेल का शांति पुरस्कार मिलता?

जिसे सर पर पहन कर वह यूँ ही ग़ज़ा पर हमले की ताईद करता?

जैसे वह पाकिस्तान में दरगाहें क्यूँ गिरा रहे हैं क़साब?

वैसे ही दरगाहें जिनमे घर से बेज़ार होने के बाद

तुमने कुछ रातें गुज़ारी थीं

जैसे चारमीनार से सट कर मंदिर बन गया है कैसे?

जैसे ये

जैसे वो

जैसे ये चिरायंध कैसी है क़साब

ये धुआँ कैसा है ...

Dec 8, 2012

ghumantu Anu ki kavita

By Anu (Main Ghumantu)

झाड़ू की सींक 
और ऊन की कतरनों 
बच्चों की फ्रॉक की फ्रिल से
निकालकर रखे गए 
रेशमी धागों 
गरारे के गोटों से 
हम बनाएंगे 
गुड़िया 

एक गुड्डा भी 
रूमाल की धोती
पहन लेगा 

बची-खुची ईटों
और सूखे हुए पत्तों से 
दोनों के लिए
बनाएंगे आठ कमरों
वाली मड़ैईया
लगाएंगे चांदनी, 
चुनेंगे हरसिंगार 
खाएंगे वो अंजीर 
जिनके पत्तों पर 
कल देखी थी
बैठी हुई एक इल्ली

गुड़िया गुड्डा ले जाएगी
इल्ली तितली बन जाएगी 
वक़्त खाली हो जाएगा
घर मिट्टी मिल जाएगा 

जो बाकी रह जाएगा 
एक फ़ितना-सा दिल मेरा होगा 
एक इतना-सा दिल तेरा होगा। 

Dec 28, 2011

कोई उम्मीद बर नहीं आती

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती

आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती...

Apr 19, 2011

Jeevan beeta jaata hain

सब जीवन बीता जाता है
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है

समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है

बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है

वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है

सब जीवन बीता जाता है.

Shri Jaishankar Prasad

Apr 7, 2011

Jaishankar Prasad's

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

Mar 2, 2011

Kalidas, sach batlana

कालिदास! सच-सच बतलाना
इन्दुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोये थे?
कालिदास! सच-सच बतलाना!

शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोये थे
कालिदास! सच-सच बतलाना
रति रोयी या तुम रोये थे?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास! सच-सच बतलाना
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थककर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवल गिरि के शिखरों पर
प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोये थे!

कालिदास! सच-सच बतलाना!



Baba Nagarjun

Mar 1, 2011

Satya toh bahut mile

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले ।

कुछ नये कुछ पुराने मिले
कुछ अपने कुछ बिराने मिले
कुछ दिखावे कुछ बहाने मिले
कुछ अकड़ू कुछ मुँह-चुराने मिले
कुछ घुटे-मँजे सफेदपोश मिले
कुछ ईमानदार ख़ानाबदोश मिले ।

कुछ ने लुभाया
कुछ ने डराया
कुछ ने परचाया-
कुछ ने भरमाया-
सत्य तो बहुत मिले
खोज़ में जब निकल ही आया ।

कुछ पड़े मिले
कुछ खड़े मिले
कुछ झड़े मिले
कुछ सड़े मिले
कुछ निखरे कुछ बिखरे
कुछ धुँधले कुछ सुथरे
सब सत्य रहे
कहे, अनकहे ।

खोज़ में जब निकल ही आया
सत्य तो बहुत मिले
पर तुम
नभ के तुम कि गुहा-गह्वर के तुम
मोम के तुम, पत्थर के तुम
तुम किसी देवता से नहीं निकले:
तुम मेरे साथ मेरे ही आँसू में गले
मेरे ही रक्त पर पले
अनुभव के दाह पर क्षण-क्षण उकसती
मेरी अशमित चिता पर
तुम मेरे ही साथ जले ।

तुम-
तुम्हें तो
भस्म हो
मैंने फिर अपनी भभूत में पाया
अंग रमाया
तभी तो पाया ।

खोज़ में जब निकल ही आया,
सत्य तो बहुत मिले-
एक ही पाया ।



Sachchidanand H Vatsyayana 'Agyeya'

Jan 29, 2011

Ghalib's Hazaron khwaishein

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।

डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो ख़ूँ जो जो चश्मे-तर से उम्र यूँ दम-ब-दम निकले ।

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे कामत दराज़ी का
अगर उस तुर्रा-ए-पुर पेचो-ख़म का पेचो-ख़म निकले ।

हुई जिनसे तवक़्क़ो ख़स्तगी दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़े-सितम निकले ।

ज़रा कर ज़ोर सीने में कि तीरे-पुर-सितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले ,जो दिल निकले तो दम निकले ।

मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाए
हुई सुबह और घर से कान पर धर कर क़लम निकले।

मुहब्बत में नही है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले ।

ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम,
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही पत्थर सनम निकले ।

कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले।

Jan 18, 2011

Samajhdaaron ka geet

हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं।

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम
हम बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिये
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं |

मगर हम क्या कर सकते हैं,
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है ?
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के,
 ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्यों बच जाते हैं,यह भी हम समझते हैं।
हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह
सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं
कि समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं
कि भेड़ियाधसान होती है।

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिये तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं, हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं।

वैसे हम अपने को किसी से कम
नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफे़द और
सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में
तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।

Gorakh Pandey

Nov 30, 2010

Kitni Navo mein kitni baar

कितनी दूरियों से कितनी बार
कितनी डगमग नावों में बैठ कर
मैं तुम्हारी ओर आया हूँ
ओ मेरी छोटी-सी ज्योति!
कभी कुहासे में तुम्हें न देखता भी
पर कुहासे की ही छोटी-सी रुपहली झलमल में
पहचानता हुआ तुम्हारा ही प्रभा-मंडल। 
कितनी बार मैं,
धीर, आश्वस्त, अक्लांत—
ओ मेरे अनबुझे सत्य! कितनी बार...

और कितनी बार कितने जगमग जहाज़
मुझे खींच कर ले गये हैं कितनी दूर
किन पराए देशों की बेदर्द हवाओं में
जहाँ नंगे अंधेरों को
और भी उघाड़ता रहता है
एक नंगा, तीखा, निर्मम प्रकाश—
जिसमें कोई प्रभा-मंडल नहीं बनते
केवल चौंधियाते हैं तथ्य, तथ्य—तथ्य—
सत्य नहीं, अंतहीन सच्चाइयाँ...
कितनी बार मुझे
खिन्न, विकल, संत्रस्त— कितनी बार!

Poetry by Sachchidanand Hiranand Vatsyayan 'Agyeya'

Sep 30, 2010

संपाती / रामधारी सिंह "दिनकर

तुम्हें मैं दोष नहीं देता हूँ।
सारा कसूर अपने सिर पर लेता हूँ।

यह मेरा ही कसूर था
कि सूर्य के घोड़ों से होड़ लेने को
मैं आकाश में उड़ा।

जटायु मुझ से ज्यादा होशियार निकला
वह आधे रास्तें में ही लौट आया।

लेकिन मैं अपने अहंकार में
उड़ता ही गया
और जैसे ही सूर्य के पास पहुँचा,
मेरे पंख जल गये।

मैंने पानी माँगा।
पर दूर आकाश में
पानी कौन देता है ?

सूर्य के मारे हुए को
अपनी शरण में
कौन लेता है ?

अब तो सब छोड़कर
तुम्हारे चरणों पर पड़ा हूँ।
मन्दिर के बाहर पड़े पौधर के समान
तुम्हारे आँगन में धरा हूँ।

तुम्हें मैं कोई दोष नहीं देता स्वामी !
‘‘आमि आपन दोषे दुख पाइ
वासना-अनुगामी।’’

Aug 1, 2010

Yeh thi na hamari kismat ke wisal e yaar hota

ये न थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तज़ार होता
तेरे वादे पर जिये हम तो ये जान झूठ जाना
के ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अह्दबोदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तवार होता
कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता
रग-ए-सन्ग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता

ग़म अगर्चे जाँगुसिल है, पे कहाँ बचे के दिल है
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता, ग़म-ए-रोज़गार होता
कहूँ किस से मैं के क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्योँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता
उसे कौन देख सकता कि यगना है वो यक्ता
जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो चार होता

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान "ग़ालिब"
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होता |

Mar 13, 2010

Kya Gaau by Nirala

क्या गाऊँ? माँ! क्या गाऊँ?
गूँज रहीं हैं जहाँ राग-रागिनियाँ,
गाती हैं किन्नरियाँ कितनी परियाँ
कितनी पंचदशी कामिनियाँ,

वहाँ एक यह लेकर वीणा दीन
तन्त्री-क्षीण, नहीं जिसमें कोई झंकार नवीन,
रुद्ध कण्ठ का राग अधूरा कैसे तुझे सुनाऊँ?--
माँ! क्या गाऊँ?

छाया है मन्दिर में तेरे यह कितना अनुराग!
चढते हैं चरणों पर कितने फूल
मृदु-दल, सरस-पराग;

गन्ध-मोद-मद पीकर मन्द समीर
शिथिल चरण जब कभी बढाती आती,
सजे हुए बजते उसके अधीर नूपुर-मंजीर!

वहाँ एक निर्गन्ध कुसुम उपहार,
नहीं कहीं जिसमें पराग-संचार सुरभि-संसार
कैसे भला चढ़ाऊँ?--
माँ? क्या गाऊँ?



Suryakant Tripathi (21 फ़रवरी 1896 - 15 अक्तूबर 1961)....

Sneh nirjhar beh gaya hain by 'Nirala'

स्नेह-निर्झर बह गया है!
रेत ज्यों तन रह गया है।
आम की यह डाल जो सुखी दिखी,
कह रही है-"अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ-"
जीवन दह गया है।
दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल;
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल-
ठाट जीवन का वही
जो ढह गया है।
अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा।
बह रही है हृदय पर केवल अमा;
मै अलक्षित हूँ; यही
कवि कह गया है।

Koshish by Suryakant Tripathi 'Nirala'

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है ।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है ।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है ।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में ।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो ।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम ।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।
I never liked this poem because it sounded motivational. But, Suryakant Tripathi wrote it, I admire him. 

Mar 11, 2010

Mukti ki Kaamna by Agyeya

मुक्ति की कामना से मुक्त रहती सी
उस औरत का आकाश कहां है?

ठीक-ठीक नहीं बता सकता
कि मैं उस ‌औरत को कितना सही-सही जानता हूं
जब कि उसे मां पुकारने के समय से ही
उसके साथ हूं।
आंचल पकड़ता
छातियों से चिपकता कभी
उचक कर पीठ पर उसकी गर्दन सूंघता।

उस औरत को प्यार करना
मेरे स्मृति पुंज में
एक खत्म न होने वाली अवधि की तरह है
बिना हड़बड़ाहट
एक कछुए के जीवन जैसी
उसे मां पुकारने से कहीं ज्यादा लंबी
कहीं ज्यादा गहरी
कहीं ज्यादा दूर, तटों से
जबकि मां पुकारने से कहीं ज्यादा लंबी
वक्फा-दक्फा / जैसे
कौंधे होती है पल दो पल की
अपने छौनों के लिए जब
आती है मादाएं उथले तटों पर
कभी- कभार
और अवसाद के फेनिल कुहरे में से झरता
मां जैसा उस का रूप
अस्पष्ट-अस्पष्ट
तो भी बहुत कुछ ठोस
सुच्चा होने का आश्वासन देता
कि जैसे वह तो है ही
धुन्ध के पार भी
आर भी.....

और उसकी आत्यंतिक इच्छाएं
उड़ती हैं
सपनों ही में
गिरती हैं धड़ाम से
सीढ़ियों से औंधे मुंह
पीठ पर भारी गट्ठर उठाए
कड़ी धरती पर
बार-बार / तुड़वा बैठती एड़ियाँ
पसलियाँ, और जाने क्या-क्या
उस औरत के मेरी माँ होने के इलावा
मुझे कई बार लगा
कि रही होगी उसकी अपनी एक अलग जिंदगी भी
कि जिस के बारे कैसे कहूं
जब कि उसे माँ कहता हूं
और ना कैसे कहूं
जबकि दिखावा करता हूं
कि तकरीबन उसे जानता हूं।

जैसे कि मान लीजिए उसका वह आकाश ही!
मेरे इलावा
चांदनी रातों में जिसे
कहां देख पाती होगी
उस की सूखी, लाल, बीमार आंखें
भटकती धरती पर ही मानो
टूट छूट कर गिरी हुई
और खोई हुई
छोटी-मोटी काम की जरूरी चीज कोई
खोजती हो!

या कि उसकी देह ही
जिसे वह अपना मानकर
अथवा न मान कर ही
सताती रही
सदा-सदा
मुंह अंधेरे दूध की बाल्टियाँ भर लाती
और कुचले जाते
भारी खुरों के नीचे उस के पैर
हां, उस की देह ही तो
बजका दी गई कितनी ही बार
दीवारों के साथ
कितने ही जानवरों की भूख मिटाती
घर और पशुशाला में
पता ही न चला होगा
मेरी माँ सी उस औरत को
कि कब घुसती चली गई अनाधिकार उस में
एक उन्मत्त पुरूष की शातिर महत्वाकाँक्षा!

कि भाग निकलने का
जब भी आया होगा खयाल
अनायास
भारी लगने लगे होंगे उसे अपने पैर!
हां, ठीक-ठीक बता सकता हूं
मैं ही
कि आज भी
उसे नहीं मालूम है ठीक-ठीक
कि बांध दी गई थी वह
मेरे उसे माँ कहने से बहुत पहले
मेरे उसे प्यार करने से भी बहुत पहले
मेरे जैसे अद्श्य खूंटो से
मेरे पिता की दुधारू गाय के ठीक बगल में
निपट दोहन के लिए

यों कहने को मैं
ऐसा भी कह सकता हूं
उस औरत की काल्पनिक मुक्ति पर / रो-रो कर
कि क्या शक कि वह जीती चली आई
पोंछती
बदरंग हो चले दामन से
कैसी‍-कैसी वाहियात गंदगियाँ
और चमकाती
कैसे गलीज अंधियारे
इस साफ शफ्फाक घर जैसी इमारत के
जिसे वह अपना मान कर
अथवा न मान कर ही
कि क्या था
कि पोंछ नहीं पाई
अपनी चौखट से बाहर बिखरा
उसका अपना ही आकाश
पूर्णिमा की चकाचौंध में भी
जो रहा धुंधला ही
आंखें उसकी
मानो सजल थीं
उस औरत की चाँदनी रातों को
क्या था कि सदा
लगा रहा ग्रहण?

क्या उसका पुत्र?
और उसके पुत्र के सिवा
उस की सूखी आंखों के
तमाम तारे
क्यों न थे निर्वाण के पक्ष में?
उस औरत की मुक्ति के?

उस मुक्ति सी वायवी अवधारण के?
उस मुक्ति की कामना से मुक्त रहती सी
अपनी मां जैसी उस औरत के लिए
जार-जार रोने से पहले
मंडराती है मेरे मस्तिष्क विवर में चकिल
उस मुक्ति की (अव) धारणा में लोट-पोट
अपनी, अलग-अलग डिजाईनर
मुक्तिकामी इच्छाएँ ओढ़े हुए
इस मदहोश भूखंड की
'उदात्त' महिलाएँ!

मीरा तो नहीं
तसलीमा भी शायद
पर हां, कह सकते हैं
इंदिरा, बनेजीर
टेरेसा, महा श्वेता
और अभी-अभी अरूंधति
बिल्कुल अभी ही
जैसे तमाम इनामी औरतें
पुरस्कृत बुकर पुलित्जर
प्रश्नवाचकों की तरह
शोभा डे
किरन बेदी
किरन खैर
किरन देसाई
किरन मेरी मां सी उस औरत की आंखों में
कहां?
जो सजल रह-रह कर / सदा
जो जल रही, सूखती, लाल-लाल / कहां
उसका दर्दनिवारक सुकून?

क्या तुम बता सकते हो ठीक-ठीक
कि बचती हुई बाल-बाल
विक्षेप से
भयभीत और उद्वेलित िस
भीषण समय में अपने पुत्र के इलावा
क्या कुछ ढ़ोती हुई पीठ पर
चुपचाप
सिमरती वज्रगुरू
अपने पुत्र के इलावा
इस सारी धरती की बेहतरी के लिए
जो कूर हुई बार-बार उसी के लिए
कहां है
उस औरत का आकाश?
जिसे अपना मान कर
अथवा न मान कर ही
मुक्त हो सके वह!

Feb 25, 2010

Achchha hain by Mirza Asadulla Khan 'Ghalib'

हुस्न-ए-मह ग़र्चे बा-हँगाम-ए-कमाल अच्छा है,
उससे मेरा मह-ए-ख़ुरशीद जमाल अच्छा है।

बोसा देते नहीं और दिल है हर लह्ज़ा निगाह,
जी में कहते हैं कि मु़फ्त आए तो माल अच्छा है।

और बाज़ार से ले आए अगर टूट गया,
साग़र-ए-जम से मेरा जाम-ए-सि़फाल अच्छा है।

बेतलब दें तो मज़ा उसमें सिवा मिलता है,
वो गदा जिसको न हो ख़ू-ए-सवाल अच्छा है।

हम-सुख़न तेशे ने फ़र्हाद को शीरीं से किया,
जिस तरह का कि किसी में हो कमाल अच्छा है।

क़तरा दरिया में जो मिल जाए तो दरिया हो जाए,
काम अच्छा है वो जिसका कि मआल अच्छा है।

ख़िज़्र सुल्ताँ को रखे ख़ालिक-ए-अक्बर सर-सब्ज़,
शाह के बाग़ में ये ताज़ा निहाल अच्छा है।

उनके देखे से आ जाती है मुँह पे जो रौनक
वो समझते है बीमार का हाल अच्छा है ।

देख ये पाते उसाक बुतो से क्या फ़ैज
इक ब्रहामन ने कहा है कि ये साल अच्छा है ।

हमको मालूम है जन्नत कि हकीकत लेकिन
दिल को खुश रखने को "गालिब" ये खयाल अच्छा है | 

Ghalib's Duniya mere aage .

बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे 


इक खेल है औरंग-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक
इक बात है ऐजाज़-ए-मसीहा मेरे आगे

जुज़ नाम नहीं सूरत-ए-आलम मुझे मंज़ूर
जुज़ वहम नहीं हस्ती-ए-अशिया मेरे आगे

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे

मत पूछ के क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख के क्या रंग है तेरा मेरे आगे

सच कहते हो ख़ुदबीन-ओ-ख़ुदआरा हूँ, न क्योँ हूँ
बैठा है बुत-ए-आईना सीमा मेरे आगे

फिर देखिये अन्दाज़-ए-गुलअफ़्शानी-ए-गुफ़्तार
रख दे कोई पैमाना-ए-सहबा मेरे आगे

नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है मैं रश्क से गुज़रा
क्यों कर कहूँ लो नाम न उसका मेरे आगे

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

आशिक़ हूँ माशूक़ फ़रेबी है मेरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मेरे आगे

ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते
आई शब-ए-हिजराँ की तमन्ना मेरे आगे

है मौजज़न इक क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ  काश! यही हो
आता है अभी देखिये क्या-क्या मेरे आगे

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे

हमपेशा-ओ-हममशरब-ओ-हमराज़ है मेरा
'गा़लिब' को बुरा क्यों, कहो अच्छा, मेरे आगे

Feb 19, 2010

Shok ki Santaan by Ramdhari Singh 'Dinkar'

हृदय छोटा हो,
तो शोक वहां नहीं समाएगा।
और दर्द दस्तक दिये बिना
दरवाजे से लौट जाएगा।

टीस उसे उठती है,
जिसका भाग्य खुलता है।
वेदना गोद में उठाकर
सबको निहाल नहीं करती,
जिसका पुण्य प्रबल होता है,
वह अपने आसुओं से धुलता है।

तुम तो नदी की धारा के साथ
दौड़ रहे हो।
उस सुख को कैसे समझोगे,
जो हमें नदी को देखकर मिलता है।
और वह फूल
तुम्हें कैसे दिखाई देगा,
जो हमारी झिलमिल
अंधियाली में खिलता है?

हम तुम्हारे लिये महल बनाते हैं
तुम हमारी कुटिया को
देखकर जलते हो।
युगों से हमारा तुम्हारा
यही संबंध रहा है।
हम रास्ते में फूल बिछाते हैं
तुम उन्हें मसलते हुए चलते हो।

दुनिया में चाहे जो भी निजाम आए,
तुम पानी की बाढ़ में से
सुखों को छान लोगे।
चाहे हिटलर ही
आसन पर क्यों न बैठ जाए,
तुम उसे अपना आराध्य
मान लोगे।

मगर हम?
तुम जी रहे हो,
हम जीने की इच्छा को तोल रहे हैं।
आयु तेजी से भागी जाती है
और हम अंधेरे में
जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।

असल में हम कवि नहीं,
शोक की संतान हैं।
हम गीत नहीं बनाते,
पंक्तियों में वेदना के
शिशुओं को जनते हैं।

झरने का कलकल,
पत्तों का मर्मर
और फूलों की गुपचुप आवाज़,
ये गरीब की आह से बनते हैं।

Manushyata by Ramdhari Singh 'Dinkar'

है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार;
पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार|
भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम;
बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम|
लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?
यह नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञानं का श्रम व्यर्थ|
यह मनुज, जो ज्ञान का आगार;
यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार |
छद्म इसकी कल्पना, पाखण्ड इसका ज्ञान;
यह मनुष्य, मनुष्यता का घोरतम अपमान|