बीस-बीस रुपये में बिकती है कवी की कल्पना.
कभी रखती थी रेगिस्तान में बारिश लाने का दम,
आज नहीं मोल पाती है अपने एवज में एक प्याला जाम.
यह कैसी हैं वक़्त की विडम्बना,
कभी राज-दरबारों की शान होती थी यह कल्पना,
आज बेजान दीवारों के पोस्टर पर,
ढूँढती हैं अपनी दुनिया.
इस कल्पना का भी अजीब हैं रंग,
कभी इसने लडवाई थी आज़ादी की जंग,
आज न जाने क्यों ?
बेजान लगते हैं इसके सारे अंग.
कभी हरयाली बिखेरती थी कवी की धुन,
आज मूक-बधिर सी बैठी हैं, नहीं पाती कुछ बोल-सून.
जो कभी फैलाती थी दुनिया में अमन और प्यार,
आज बेबस निगाहों से ढूँढ रही है अपनों का दुलार.
कभी अंगडाई भरता था इसका यौवन,
आज लाचार बुढापा सा दीखता है इसका जीवन.
क्या वजह है, किस चीज़ का कवी हैं शिकार?
क्या वास्तव में मानव भूल गया हैं अपने संस्कार?
एक हाथ से नहीं बजती हैं ताली,
कुछ तो मानव होने लगा है काला,
तो कहीं,
कवी की कल्पना भी हुई हैं काली.
कभी अंगडाई भरता था इसका यौवन,
आज लाचार बुढापा सा दीखता है इसका जीवन.
क्या वजह है, किस चीज़ का कवी हैं शिकार?
क्या वास्तव में मानव भूल गया हैं अपने संस्कार?
एक हाथ से नहीं बजती हैं ताली,
कुछ तो मानव होने लगा है काला,
तो कहीं,
कवी की कल्पना भी हुई हैं काली.
Chandanmal Gupta.