बैठा हुआ चंचल नदी के तिर,
कहे की उसे नदी से बेहद प्यार हैं,
पर वह डरता हैं नाव के डूबने से.
डूबता हैं सूरज, और शायद शशि भी.
डूबना तो अच्छा होता होगा, बुरा नहीं.
पर भय से बंधा वह कहीं डूब पाता नहीं,
किसी काम में, या विचार में ही.
वह देखता; नदी का प्रवाह, जिसमे,
तिनके बहते और लोग तैरते हैं,
स्पर्धा 'तैरने' की होती हैं,
बहना और तैरना अलग अलग हैं.
वह अपनी भटकन से थका,
सदा बैठा हुआ घाट पर अकेले,
अनंत सुलगता मन छिपाए,
कुछ खोजता हैं, पैर जल में भिगोये.
शायद वह मछली पकड़ना चाहता हैं,
तभी तो जाल समीप उलझा पड़ा हैं,
किन्तु पकड़ कुछ भी पाता नहीं,
वह बकता हैं, नदी के गर्भ में भँवर हैं !
आप उस पर हँस दीजिएगा?
उसके बेतुके बावलेपन पर,
उसके बेतुके बावलेपन पर,
लेकिन मानो की अगर,
वह सच कह रहा हो?
अजीब सा, बेहूदा सा,
परन्तु झूठ नहीं, सच,
उसमें सिमटा हुआ,
सिर्फ, उसका अपना सच.
तर्क नहीं समझाना,
तब, अगर हो सके,
अपना हाथ बढ़ाना,
ताकि वह उसे थाम सके.
साहब, हो सकता हैं,
भँवर थमे, वह अभय बन जाए.
विराट प्रवाह, प्रशांत हो जाए.
वह वापस एक मछली बन पाए.
वह सच कह रहा हो?
अजीब सा, बेहूदा सा,
परन्तु झूठ नहीं, सच,
उसमें सिमटा हुआ,
सिर्फ, उसका अपना सच.
तर्क नहीं समझाना,
तब, अगर हो सके,
अपना हाथ बढ़ाना,
ताकि वह उसे थाम सके.
साहब, हो सकता हैं,
भँवर थमे, वह अभय बन जाए.
विराट प्रवाह, प्रशांत हो जाए.
वह वापस एक मछली बन पाए.