प्रखर ग्रीष्म में घोर आदित्य,
उद्दाम अग्नि बहा रहा |
तुम आओ शशि शीतल अब,
अनल अंशुओं में सुधा भरो ||
मैं मिटटी, अधूरी, अधीर,
जलरहित जीती रही |
बरसों, प्रियतम बरसो अब,
मुझ में नवप्राण भरो ||
|Scent of the parched soil| |Scent of the rain drenched soil|